Monday, August 21, 2017

सतगुरु श्री गरीबदास महाराज जी का परलोक गमन



सतगुरु श्री गरीबदास महाराज जी का परलोक गमन

छुड़ानी धाम में अवतार ले कर अनेक प्रकार की लीलाएं करते हुए, वाणी की रचना और प्रचार करते हुए, अनेका अनेक लोगों का उद्धार करते हुए जब सतगुरु गरीबदास जी की आयु ६१ वर्ष और तिन मास की हुई तो आप जी ने परमधाम पधारने का संकल्प किया | अपने सभी प्रेमी भक्त, संत और सेवकों को आज्ञा पत्र लिखकर भेजे की अगर कोई अंतिम दर्शन करना चाहता है तो वह फाल्गुन सुदी एकादशी को छुड़ानी में पहुंच जाए, क्यूंकि हमने उसदिन परमधाम पधारने का निश्चय किया है | जिसे भी पत्र मिला वह संदेश पाकर स्तब्ध रह गया | चित्त उदास हो गया, मन शोक से ग्रसित दो गया | जिसे जिसे भी संदेश मिला वह सभी कार्य छोड़कर महाराज श्री के दर्शन के लिए पहुंच गया | उस एकादशी के दिन बहुत अधिक मात्रा में लोग एकत्रित होने लगे | जिनमें साधू, संत, महापुरुष, भक्त और सत्संगी जन सभी शामिल थे |  उस समय ५०० से अधिक तो महाराज जी के वैरागी साधू थे |

सभी साधू, संत, महापुरुष, भक्त और सत्संगी जन बेरियों के बाग में एकत्रित हुए  और परामर्श करने लगे की महाराज जी से प्रार्थना करनी चाहिये की आप अपने परलोक गमन का विचार त्याग दें | आप अपनी संगत को छोड़कर ना जाएँ, आप के बिना आप की यह संगत अनाथ हो जाएगी | आप इसी तरह अपने पवित्र दर्शनों से संगत को निहाल करते रहें | एकत्रित हुए संप्रदाय ने स्वामी संतोष दास जी, जो की सभी में वरिष्ठ थे, को अपना प्रतिनिधि चुना और महराज जी से प्रार्थना करने के लिए उन्हें आगे करके सभी महराज जी के सामने उपस्थित हुए | सभी ने प्रेमपूर्वक दण्डवत् प्रणाम किया और हाथ जोड़कर आप के आगे खड़े हो गए | महाराज जी ने पूछा सभी इकठ्ठे होकर क्यूँ आए हो तो, स्वामी संतोष दास जी हाथ जोड़कर बोले,  हे दयानिधे ! सकल समुदाय की आप के चरणों में विनम्र प्रार्थना है की “हम सभी की आत्माएं अभी तक आप के पावन दर्शनों से तृप्त नहीं हुई है, इसलिए कृपा करके आप अभी अपने परलोक गमन का संकल्प त्याग दें” | हम सभी अभी कुछ और समय तक आप की मन मोहक मूर्त का दर्शन करना चाहते हैं | गुसाईं जी बोले और कितने दिन दर्शन करना चाहते हो ? ( महाराज जी की प्रेरणा से ) स्वामी संतोष दास जी के मुख से एका एक निकल गया की “महाराज जी हम सभी पर छह महीने की कृपा और कर दीजिये” | महाराज जी ने भी तथास्तु कह दिया और कहा की अब छह महीने बाद हम आप के कहने से भी ना रुकेंगे | इस तरह आप जी ने परलोक गमन की फाल्गुन सुदी एकादशी को परलोक गमन की तिथि को स्थगित कर दिया |

धीरे धीरे छह मास व्यतीत हो गए | जब भाद्रपद का मास शुरू हुआ तो महाराज जी ने सभी को फिर से आज्ञा पत्र भिजवाए की हमारे परलोक गमन का समय निकट आ गया है, जो भी दर्शन करना चाहे आकर दर्शन कर ले | पुन: सभी भक्त, साधू संत, महापुरुष छुड़ानी में महाराज जी के दर्शन के लिए एकत्रित होने लगे | महाराज जी के आज्ञा से सभी के लिए अटूट भण्डारा चलाया गया | भादों सुदी दूज को बेरियों वाले बाग में सभा का आयोजन किया गया | पूरा बाग आए हुए सत्संगियों से भर गया | सभा के बीच में सतगुरु जी का सिंहासन लगाया गया | कुछ लोग महाराज जी को बड़ी सज - धज के साथ सभा में ले आए | सतगुरु जी सिंहासन पर विराजमान होकर हंसों को अपना अंतिम संदेश देते हुए कहने लगे – हे भक्त जनों आप समय समय पर अपनी अवश्यकता के अनुसार सतपुरुष से कुछ न कुछ मांगते ही रहते हो | आप को इस बात का पूरा पूरा ज्ञान नहीं की सतपुरुष से क्या मांगना चाहिये | कौन सी वस्तु मांगने वाली है ? और कौन सी छोड़ने वाली है, यह मैं आप को बताता हूँ आप सभी जन इसे अपने हृदय में अच्छी तरह से बसा लो | इसे हमारा अंतिम संदेश समझ कर अपने मन में बसा लो, कभी भूलना नहीं | अगर आप लोग हमारे आदेशानुसार आचरण करोगे तो आप को चार पदार्थों की प्राप्ति होगी | जब तक जीवित रहोगे तब तक सुख भोगोगे और शरीर छोड़ने पर सद्गति प्राप्त होगी |

महाराज जी ने फिर विधि (अर्थात जो करना है या मांगना है) और निषेद (अर्थात जिन बातों का त्याग करना है ) रूप में दो शब्दों का उच्चारण किया | यह दोनों शब्द श्री ग्रन्थ साहिब में सर्व लक्षणा ग्रन्थ के नाम से संकलित है | यथा

|| अथ सर्व लक्षणा ग्रन्थ ||
 उत्तम कुल कर्तार दे, द्वादश भूषण संग । रूप द्रव्य दे दया करि, ज्ञान भजन सत्संग ।।१।।
शिल संतोष विवेक दे
, क्षमा दया एकतार । भाव भक्ति बैराग दे, नाम निरालम्ब सार ।।२।।
योग युक्ति जगदीश दे
, सूक्ष्म ध्यान दयाल । अकलि अकीन अजन्म जति, अष्ट सिद्धि नौ निधि ख्याल ।।३।।
स्वर्ग नरक बांचै नहीं
, मोक्ष बंधन से दूर । बड़ी गरीबी जगत में, संत चरण रज धूर ।।४।।
जीवत मुक्ता सो कहौ, आशा तृष्णा खण्ड । मन के जीते जीत है, क्यों भरमैं ब्रह्मण्ड ।।५।।
शाला कर्म शरीर में
, सतगुरू दिया लखाय । गरीबदास गलतान पद, नहीं आवैं नहीं जाय ।।६।।
                     

चौरासी की चाल क्या, मो सेती सुनि लेह । चोरी जारी करत हैं, जाके मौंहडे खेह ।।१।।
काम क्रोध मद लोभ लट
, छुटी रहै विकराल । क्रोध कसाई उर बसै, कुशब्द छुरा घर घाल ।।२।।
हर्ष शोक हैं श्वान गति
, संसा सर्प शरीर । राग द्वेष बड़ रोग हैं, जम के परे जंजीर ।।३।।
आशा तृष्णा नदी में
, डूबे तीनौं लोक । मनसा माया बिस्तरी, आत्म आत्म दोष ।।४।।
एक शत्रु एक मित्र है
, भूल पड़ी रे प्राण । जम की नगरी जाहिगा, शब्द हमारा मान ।।५।।
निंद्या बिंद्या छाडि दे
, संतों सूं कर प्रीत । भवसागर तिर जात है, जीवत मुक्ति अतीत ।।६।।
जे तेरे उपजै नहीं
, तो शब्द साखि सुनि लेह । साक्षीभूत संगीत है, जासे लावो नेह ।।७।।
स्वर्ग सात असमान पर
, भटकत है मन मुढ़ । खालिक तो खोया नहीं, इसी महल में ढूंढ़ ।।८।।
कर्म भर्म भारी लगे
, संसा सूल बबूल । डाली पांनौं डोलते, परसत नांही मूल ।।९।।
श्वासा ही में सार पद
, पद में श्वासा सार । दम देही का खोज कर, आवागवन निवार ।।१०।।
बिन सतगुरू पावै नहीं
, खालिक खोज विचार । चौरासी जग जात है, चीन्हत नांही सार ।।११।।
मरद गर्द में मिल गये
, रावण से रणधीर । कंस केश चाणूर से, हिरणाकुश बलबीर ।।१२।।
तेरी क्या बुनियाद है
, जीव जन्म धर लेत । गरीबदास हरी नाम बिन, खाली परसी खेत ।।१३।।

इस प्रकार अंतिम संदेश देते देते शाम के चार बज गए | तब आप जी ने कहा की आप के अनुरोध पर हमने अपने संकल्प से अधिक छ: मास आप को अधिक दर्शन दिया है | आप अभी हमें रोकने का प्रयत्न ना करना क्यूंकि हम अब आप के कहने से रुकेंगे नहीं | अब हमारे गमन का समय हो गया है, इसलिए हमारी चिता तैयार की जाए |
आपके मुख से इस प्रकार की बात सूनकर समस्त जनसमूह का हृदय काप उठा, सभी सुन्न रह गए | सभी के आँखों में आंसू भर आए | लेकिन आप की आज्ञा का उलंघन करना भी कठिन था इसलिए सेवकों ने भारी मन से जिस स्थान पर आज छतरी साहिब है इसी स्थान पर चंदन की चिता का आयोजन किया | साथ ही घृत आदि सकल सुगन्धित सामग्री इकट्ठी की | बंदिछोड जी सभी सत्संगियों के साथ उठकर चिता भूमि पर आ गए | महाराज जी को स्नान करवाया गया | स्नान करने के बाद आप नए वस्त्र पहनकर चंदन की चिता पर जाकर विराजमान हो गये और एक चद्दर ओढ़कर सो गए | आप जी ने जैतराम जी को अग्नि लगाने की आज्ञा प्रदान की | जैतराम जी ने भारी मन से आप जी की आज्ञा का पालन किया | उपस्तिथ जन समुह की आँखों से आंसू निकलने लगे | हृदय विलाप करने लगा | सभी को अत्यंत दुःख हुआ की अभी हमें महाराज जी के दर्शनों का लाभ प्राप्त नहीं होगा |
चौथे दिन परिवार और सत्संगी जन मिलकर फूल (अस्थियाँ) चुगने के लिए चिता पर गए तो चिता की भस्म में से कोई अस्थि नहीं मिली | सतगुरु जी का शरीर पंच भौतिक तत्वों से नहीं बना था उनका स्वरुप तो ज्योतिमय था, इसलिए अस्थियाँ प्राप्त होना का प्रश्न ही नहीं था |
सतगुरु जी के उच्चकोटि के महापुरुष शिष्य जिनकी संख्या लगभग सवा सौ थी, सभी ने मिलकर संप्रदाय की मर्यादा स्थापित करने के लिए श्री ग्रन्थ साहिब जी का प्रकाश करके पाठ आरंभ कर दिया | सत्रह्मी वाले दिन सभी संत और सेवक एकत्रित हुए | श्री ग्रन्थ साहिब जी का पाठ समाप्त करके, प्रेमपूर्वक बड़ी धूम धाम के साथ वाणी को विधिपूर्वक भोग लगाकर महाराज जी का पूजन किया गया |
सारे संप्रदाय ने मिलकर महाराज जी की गुरु गद्दी का तिलक देने की चर्चा की और सतगुरु जी के जेष्ठ पुत्र श्री स्वामी जैतराम जी को तिलक देने का निर्णय हुआ | लेकिन माता जी की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए आप जी ने गद्दी का अधिकार अपने छोटे भाई तुरतीराम जी को दे दिया | संप्रदाय ने मिल कर तुरती राम जी को गद्दी का तिलक देकर श्री महंत बना दिया तथा भेंट चढ़ाकर उनका आदर सत्कार किया |
जिस स्थान पर महाराज जी की चिता को अग्नि दि गई थी उस स्थान की राख को एकत्रित करके एक मटके में भर लिया गया और चिता के स्थान पर एक चबुतरा बनाकर उस पर उस घट (मटके) को स्थापित करके उसपर समाधी बना दि गई | नित्यप्रति इस स्मारक की धूप दीप और आरती होने लगी | और इसी स्थान पर वार्षिक मेला लगने लगा | जिसमे दूर दूर से सत्संगी जन आकर महाराज जी को अपनी श्रद्धा के पुष्प अर्पित करने लगे |

|| सत साहिब ||

Saturday, June 17, 2017

पुजारी की पीड़ा दूर की

 बन्दीछोड़ आचार्य श्री गरीबदास जी ने अपने वाणी ग्रंथ में पारख के अंग मे गुरूदेव  कबीर साहिब जी की जीवन लीला संक्षेप में वर्णन की है। कबीर साहिब जी के समय मे भारत में मुगल साम्राज्य था। यहां का बादशाह सिकन्दर लोदी था, जो इस्लाम धर्म का कट्टर समर्थक था परन्तु श्री कबीर साहिब जी की महिमा देखकर इनका पक्का अनुयायी बन चुका था। अपने मन का भ्रम दूर करने के लिए सिकन्दर लोदी ने 52 बार श्री कबीर साहिब जी की परख (परीक्षा) की, अंत में हारकर उसे महाराज जी का लोहा मानना ही पड़ा। एक बार श्री कबीर साहिब जी ने राजा सिकन्दर को एक कौतुक दिखाया:-

सहज मते सतगुरू गये, शाह सिकन्दर पास। गरीबदास आसन दिया, संग तहाँ रैदास।।

Friday, June 9, 2017

कबीर जी का जीवन परिचय



कबीर जी का जीवन परिचय

सतगुरु बन्दिछोड़ कबीर साहिब जी का अवतरण ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरुप अधंकारमय हो रहा था। भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक अवस्था बहुत ही विकट हो गयी थी। जनता एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांधता से त्राहि- त्राहि कर रही थी और दूसरी तरफ हिंदूओं के कर्मकांडों, विधानों एवं पाखंडों से धर्म का ह्रास हो रहा था। भक्ति- भावनाओं का सम्यक प्रचार नहीं हो रहा था। सिद्धों के पाखंडपूर्ण वचन, समाज में वासना को आश्रय  दे रहे थे।

नाथपंथियों के अलखनिरंजन में लोगों का हृदय रम नहीं रहा था। ज्ञान और भक्ति दोनों तत्व केवल ऊपर के कुछ धनी, पढ़े- लिखे की बपौती के रुप में दिखाई दे रहा था। ऐसे नाजुक समय में सतगुरु बन्दिछोड़ कबीर साहिब जी का अवतरण हुआ | आप जी ने राम और रहीम के नाम पर आज्ञानतावश लड़ने वाले लोगों को सच्चा मार्ग  दिखाया । आप जी ने सभी धर्मो का समन्वय करके सत्य और श्रेष्ठ मार्ग को प्रकट किया |

कबीर साहिब जी को सिर्फ एक संत या महापुरुष या महात्मा या भक्त या योगी मान लेना उचित नहीं होगा क्यूंकि वह पारब्रह्म परमेश्वर के ही अवतार थे | कबीर जी  इन सभी के गुण से युक्त थे | कबीर जी स्वयं सिद्ध थे | बाल्यकाल से ही आप में अलौकिक एवं अद्भुत शक्तियाँ और सिद्धियाँ देखी गई थीं | सभी संतों महापुरषों ने आप जी को पारब्रह्म परमेश्वर का अवतार माना है | भविष्यपुराण भी इस बात की पुष्टि करता है की  कबीर जी पार ब्रह्म परमेश्वर के अवतार थे | यथा

भारते यंवानाक्रान्ते निर्देष्टु सत्पथं नणाम् |
हरि: कबीर नाम्ना हि कलाव तरिष्यति ||
बंधनाज्जाति भेदादेरून्मोक्तुं नन्न् कलौ किल |
वक्तुं तत्त्वं कबीर : सन् पद्मे प्रादुर्भविष्याति || १ ||
अर्थात कलियुग में जिस समय भारत वर्ष यवनों (मुसलमानों) से आक्रांत हो जायेगा उस समय मनुष्यों को सन्मार्ग का निर्देश करने के लिए साक्षात् भगवान हरि कबीर नाम से कमल पत्र के अंदर अवतरित होंगे | और जात पात, वर्ण आश्रम के बन्धनों से मुक्त करके,  भेद भाव को समाप्त करने के लिए परम तत्व का उपदेश करेंगे |
कलौ निर्गुणब्रहह्मैव कबीर दासना मत: |
अवतारन्निर्गुणास्य मार्गस्य दर्शक: || २ ||
कलियुग में निर्गुण ब्रह्म ने ही कबीर नाम से अवतार धारण किया | जिन्होंने निर्गुण भक्ति के द्वारा परम धाम का मार्ग दिखाया |

गुणातीतं निराकार निर्विकारं परात्परम |
रामं भजे कबिरोऽसौ नो दाशरथ रूपकम् || ३ ||
कबीर जी ने गुणातीत, निराकार, निर्विकार, सब से श्रेष्ठ राम का भजन किया | किन्तु उन्होंने दशरथ पुत्र राम का भजन कभी नहीं किया |

निर्गुणं ब्रह्म्परमं स्वभक्ताऽभीष्ट  सिद्धये |
अवतारति लोकेऽस्मिन् यथा कालं युगे – युगे || ४ ||

निर्गुण  पर ब्रह्म अपने भक्तों की इष्ट सिद्धि के लिए देश काल के अनुसार हर युग में अवतार धारण करते हैं |

  
अवतरण
चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥
घन गरजें दामिनि दमके बूँदे बरषें झर लाग गए।
लहर तलाब में कमल खिले तहँ कबीर भानु प्रगट भए॥[1]
संवत् चौदह सौ पचपन (१४५५) विक्रमी ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवार के दिन, एक प्रकाश रुप में सत्य पुरुष काशी के "लहर तारा'' (लहर तालाब) में उतरे। उस समय पृथ्वी और आकाश प्रकाशित हो गया। समस्त तालाब प्रकाश से जगमगा गया। हर तरफ प्रकाश- ही- प्रकाश दिखने लगा, फिर वह प्रकाश तालाब में ठहर सा गया। उस समय तालाब पर बैठे अष्टानंद वैष्णव दिव्य प्रकाश को देखकर आश्चर्य- चकित हो गये। उस प्रकाश ने जल के ऊपर कमल- पुष्प पर एक बच्चे का रूप धारण कर लिया |अष्टानंद जी ने यह सारी बातें स्वामी रामानंद जी को बतलायी, तो स्वामी जी ने कहा की वह प्रकाश एक ऐसा प्रकाश है, जिसका फल शीघ्र ही तुमको देखने और सुनने को मिलेगा तथा देखना, उसकी धूम मच जाएगी।
गरीब अनंत कोटि ब्रह्मंड में, बंदी छोड कहाय |
सो तो एक कबीर हैं, जननी जन्या न माय ||

सुबह को जब नीमा और नीरू नामक मुसलमान दम्पति उस तलब पर आए तो उन्होंने देखा की कमल के पुष्प पर एक तेजस्वी बालक पड़ा है तो उन्होंने उसे उठा कर बड़े प्रेम से मुख चूमा और अपने घर ले आए | जब काशी के लोगों को पता लगा  तो सभी बालक के दर्शन के लिए आने लगे | लोग ही नहीं देवी, देवता और ईश्वर तक दर्शन के लिए आए | बालक के तेज को देख कर आम लोग कहने लगे यह तो कोई देवता है | देवता कहने लगे यह तो ईश्वर है | और ईश्वर एक उठे यह तो परब्रह्म है | भगवान शिव जी बालक के दर्शन के लिए आए | बालक को गोद में लेकर अपने ईश को प्रणाम किया और पिता को कुंवारी गाय लाने के लिए कहा और उस गाय को दुह कर दूध निकाला और बालक कबीर को पिलाया |
काजी कुरान लेकर बच्चे का नाम रखने के लिए आये तो हर एक अक्षर कबीर में बदल गया और इस तरह बालक का नाम कबीर रखा गया |
कबीर जी के गुरु
कबीर जी ने अपनी वाणी में गुरु को बहुत ऊँचा स्थान दिया है | गुरु की बहुत महिमा गाई है | वैसे तो आप स्वयं पारब्रह्म के अवतार थे पर गुरु शिष्य की मर्यादा को अधिक मजबूत करने के लिए आप ने रामानंद जी को गुरु बनाया | रामानंद जी एक वैष्णव संत थे | योग प्राणायाम के द्वारा अपने शरीर पर विजय पा चुके थे | काशी के महापुरुषों में आप का स्थान सब से ऊँचा था | जग मर्यादा के कारण कबीर जी रामानंद जी को गुरु बनाना चाहते थे लेकिन उन्हें पता था की रामानंद जी कभी भी एक मुसलमान को अपना शिष्य नहीं बनाएंगे | इसलिए उन्होंने एक युक्ति की | जब कबीर जी पांच वर्ष के हो गए तो, जिस घाट  पर रामानंद जी सुबह सुबह स्नान को जाते थे उस घाट की सीढ़ियों पर लेट गए | स्नान करके लौटते समय रामानंद जी के पाँव की ठोकर कबीर जी को लगी और रामानंद जी ने मुख से राम राम कह दिया | बस इसी को गुरु मन्त्र मानकर कबीर जी भक्ति करने लगे और रामानंद जी को गुरु मानने लगे |
कबीर जी का परिवार
कबीर जी का जन्म दिव्य था | उनका लालन पोषण नीमा और नीरू जी ने किया | कबीर जी की पत्नी का नाम लोई था | पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का नाम कमाली था |
कबीर जी का कपड़ा बुनने का  कम करते थे | आप जी ने अपनी जाति जुलाहा कहि है
"जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरो उदासी।'
 
कबीर जी के घर में रात- दिन साधू संतों, मुडियों का जमघट रहने से बच्चों को रोटी तक मिलना कठिन हो जाता था।
कबीर जी की वाणी
कबीर जी की वांणी बहुरंगी है। कबीर जी ने किसी ग्रन्थ की रचना नही की। उनके पश्चात उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों का संकलन किया जो बीजकनाम से जाना जाता है। इस ग्रन्थ के तीन भाग हैं, ‘साखी’, ‘सबदऔर रमैनी। कबीर के उपदेशों में जीवन की दार्शनिकता की झलक दिखती है।
गुरू-महिमा, ईश्वर महिमा, सतसंग महिमा और माया का फेर आदि का सुन्दर वर्णन मिलता है। उनके काव्य में यमक, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकारों का सुन्दर समावेश दिखता है।

जीव हिंसा न करने और मांसाहार के पीछे कबीर का तर्क बहुत महत्वपूर्ण है। वे मानते हैं कि दया, हिंसा और प्रेम का मार्ग एक है। यदि हम किसी भी तरह की तृष्णां और लालसा पूरी करने के लिये हिंसा करेंगे तो, घृणां और हिंसा का ही जन्म होगा। बेजुबान जानवर के प्रति या मानव का शोषण करने वाले व्यक्ति कबीर के लिये सदैव निंदनीय थे।
कबीर की साखियों में सच्चे गुरू का ज्ञान मिलता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कबीर के काव्य का सर्वाधिक महत्व धार्मिक एवं सामाजिक एकता और भक्ती का संदेश देने में है।
उनकी महान रचना बीजक में कविताओं की भरमार है जो कबीर के धार्मिकता पर सामान्य विचार को स्पष्ट करता है। कबीर की हिन्दी उनके दर्शन की तरह ही सरल और प्राकृत थी। वो ईश्वर में एकात्मकता का अनुसरण करते थे। वो हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा के घोर विरोधी थे और भक्ति तथा सूफ़ी विचारों में पूरा भरोसा दिखाते थे।
कबीर जी सैकड़ो पोथियाँ (पुस्तकें) पढ़ने के बजाय वे प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ने को श्रेष्ठ कहा |
कबीर का मूल मंत्र था,
मैं कहता आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखिन

अवसान

आजीवन काशी में रहने के बावजूद अन्त समय सन् 1518 के करीब मगहर चले गये, क्योंकि वे कुछ भ्रान्तियों को दूर करना चाहते थे। उस समय ऐसी अवधारणा थी की काशी में मरने से स्वर्ग मिलता है तथा मगहर में मृत्यु पर नरक। उनकी मृत्यु के पश्चात हिन्दु अपने धर्म के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे और मुसलमान अपने धर्मानुसार विवाद की स्थिती में एक अजीब घटना घटी उनके पार्थिव शरीर पर से चादर हट गई और वहाँ कुछ फूल पङे थे जिसे दोनों समुदायों ने आपस में बाँट लिया।
गरीब सेवक होय कर ऊतरे, इस पृथ्वी के मांहि |
जिव उधारन जगतगुरु, बार बार बलि जांहि ||
|| सत साहिब ||