Wednesday, September 28, 2016

तुम सतगुरु कैसे कहलावौ



तुम सतगुरु कैसे कहलावौ

एक समय धर्मदास जी की शाखा का कबीर पंथी साधु हुलासीदास आचार्य श्री गरीबदास जी के दर्शन करने छुडानी आया | महाराज जी को प्रेमपूर्वक दण्डवत प्रणाम किया और नम्रतापूर्वक बन्दीछोड से कहा की अगर हुकम हो तो हम कुछ कहना चाहते हैं | 
 
महाराज जी ने कहा निर्भय होकर कहिये | तो हुलासिदास जी कहने लगे की महाराज जी मैंने आपका शब्द सुना था जिसको सुनकर मुझे आपके दर्शन करने की इच्छा हुई यहाँ आकर आपके दर्शन करने पर मेरे मन में एक संशय उत्पन्न हो गया है कृपया आप उस का निराकरण करिए | 

महाराज यह बताइये की आप खुद को सतगुरु कैसे कहलवाते हो ? आप देहधारी हैं आपके पत्नी पुत्र और परिवार है, आप सभी तरह के सांसारिक व्यवहार करते हैं | सतगुरु तो निराकार ब्रह्म स्वरुप हैं, सर्वत्र समान रूप से व्यापत है | सतगुरु तीन काल भूत, वर्तमान और भविष्य से परे है, वह तीन गति से न्यारा है | वह तो परम देश शब्द अतीत सुन का वासी है और चार दाग से न्यारा रहता है | जिसका जन्म मृत्यु है वह तो माया के अधीन होता है सतगुरु मायातीत है | वह तो मोक्ष बंधन से परे है | मान बड़ाई का उसे पता ही नहीं | ना वह अवतार धारण करता है | फिर सतगुरु को ऐसी कौन सि इच्छा हुई जो वह जगत में आ गये |

यह सुन कर महाराज जी ने कहा की अवतारों ने कभी नहीं कहा की हमें औतार कहो यह तो जगत के लोग उन्हें अवतार कहते हैं क्योंकि वह असुरों का नाश करके भक्तों का उद्धार करते हैं , सतगुरुओं ने कभी यह नहीं कहा की हमें सतगुरु कहो यह तो जगत के लोग प्रेम से उन्हें ऐसा कहते हैं क्योंकी उन्होंने नाम की नौका बना कर कितनो को पार उतार दिया | इसी तरह साधु नीर खीर का भेद बताते हैं इसलिए उन्हें साधु कहते हैं | 

यह तीनों ज्योति स्वरुप हैं | जन्म मरण तो पंच भौतिक शरीर का होता है और ज्योति ज्योत में समा जाति है | इनका आना जाना नहीं होता | सागर में उठने वाली लहर उसीमे समा जाति है उसमे जन्म या मृत्यु का कहां प्रश्न है | पानी में उठे बुलबुले को देखकर उसके अलग अस्तित्व का आभास होता है परन्तु पानी के बिना बुलबुले का कोई अस्तित्व नहीं है | तत्वत तो वह पानी ही है बुलबुला तो उसका नाम मात्र है वह पहले भी पानी था, अब भी पानी है और फिर पानी ही रहेगा | ऐसे ही सतगुरु के स्वरुप को देख कर उनका ब्रह्म से पृथकत्व का जिव को भ्रम होता है परन्तु वह ब्रह्म ही हैं | 

परमपिता परमेश्वर (साहिब) ही सतगुरु बन कर हंसो का उद्धार करने हेतु आटे हैं शब्द रुपी बाण मार कर पार उतार देते हैं |

सतगुर अजर अमर अविनाशी है | सात धातु के इस स्थूल शरीर में नौ तत्व का सूक्ष्म शरीर रहता है लेकिन सतगुरु इन दोनों से अलग है | जैसे जल से भरे घड़े में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है तो ऐसा आभास होता है की मानो सूर्य उस घड़े में आगया हो लेकिन वह तो सूर्य का प्रतिबिम्ब मात्र है ऐसे ही देह धारी सतगुर उस का प्रतिबिम्ब मात्र ही है | जैसे घड़े के टूट जाने पर उस के अंदर का प्रतिबिम्ब भी नष्ट हो जाता है लेकिन सूर्य वैसा ही रहता है इसी तरह इस देह के नष्ट हो जाने पर भी सतगुर नष्ट नहीं होता क्यूँ की वह कभी इस देह में आया ही नहीं था |

सतगुरु निराकार हैं लेकिन हंसों के उद्धार के लिए सतगुरु देह धार कर आते हैं क्योंकि साकार को साकार ही चिता सकता है | सतगुरु आकार लेकर निराकार का भेद बताते हैं |

यह सुन कर हुलासिदास संतुष्ट और प्रसन्न होकर कहने लगे की महाराज जी आप ने मुझ पर बड़ी कृपा की है आप साक्षात कबीर जी का ही अवतार हैं | अनेक प्रकार से स्तुति और प्रार्थना करके वह वहां से चले गये |

Thursday, July 28, 2016

श्री अखंड पाठ की विधि

अनंता-अनन्त अखिल ब्रह्मंड नायक ज्योत बन्दीछोड़ गरीब दास साहिब जी ने श्री छुड़ानी धाम जिला झज्जर तहसील बहादुरगढ़ हरियाणा में सन १७१७ में अवतार लिया | बन्दीछोड़ गरीब दास साहिब जी ने जिव-कल्याण के लिए पावन-पवित्र कल्याणकारी अमृतमई वाणी “श्री ग्रन्थ साहिब” की रचना की |

Wednesday, April 6, 2016

सतगुरु हंस उधारन आए

एक समय अलमोड़ा जो की उत्तरप्रदेश में एक पर्वतीय क्षेत्र है, वहां पर एक फलाहारी सिद्ध मनसाराम जी रहते थे | उन्होंने सतगुरु गरीबदास जी के बारे में पता लागा तो उनके मन में कुछ प्रश्न उठ खड़े हुए | उनके एक शिष्य थे हांडीभडंग जो देशाटन करते रहते थे | मनसाराम जी ने उन्हें अपने प्रश्नों के समाधान हेतु सतगुरु जी से मिलने के लिए भेजा | हांडीभडंग पूर्व से पश्चिम दिशा की तरफ घूमते घूमते छुडानी आ पहुँचे |

Tuesday, December 1, 2015

महाराज भुरीवालों के वट्टे


बन्दीछोड़ गरीब दास साहिब जी अपनी वाणी में फरमाते है कि:
गरीब, आजिज मेरे आसरे, मैं आजीज के पास । 
          गैल गैल लाग्या फिरुँ, जब लग धरनि आकाश ।। 
      परमात्मा सदैव अपने भक्तो की रक्षा करता है । हमे सदैव ही परमात्मा की भक्ति में लीन रहना चहिये, तभी मनुष्य का उद्धार हो सकता है ।
                            एक बार की बात है कि चौदा ग्राम पंजाब में श्रीराम नामक एक व्यक्ति रहता था । वह सतगुरु

Saturday, October 17, 2015

सतगुरु भुरीवालों की गुरु गद्दी परम्परा (गरीबदासी)



सतगुरु ब्रह्मसागर भुरीवाले जी >स्वामी लालदास जी >स्वामी ब्रह्मानन्द जी >स्वामी चेतनानन्द जी वेदान्ताचार्य
गत शताब्दी में पंजाब के जन मानस को जाग्रत करने के लिए और सतगुरु गरीबदास जी का संदेश जन-जन तक पहुँचने के लिए गरीबदास जी का तदरूप फिर से अवतरित हुआ | इस रूप  को “श्री ब्रह्मसागर जी भूरीवाले”

Sunday, August 16, 2015

Emperor Muhammed Shah Invites Garib Das Ji

                          After the death of Bahadur Shah in 1712, it is said, "no member of the house of Timure remained in india, who was fit to take the helm of the ship of the State, which soon drifted on to the rocks. The degraded wretches that polluted the throne of Akbar deserve only a passing notice, the rest of our history is filled with the tragedy of disruption of the splendid edifice reared and fostered by the great Mughals". Farrukhsiyar was deposed, imprisoned, blinded and ultimately killed in an ignominious manner in April, 1719.

Friday, June 26, 2015

तेजपुंज के तख़्त पर सतगुरुदेव जी



बन्दीछोड़ गरीब दास साहिब जी अपनी वाणी में फरमाते है कि :
            उत्तम कुल कर्तार देद्वादश भूषण संग ।
                          रूप द्रव्य दे दया करिज्ञान भजन सत्संग ।।                                      हे प्रभू! आप मुझे अच्छा भक्तिमय कुल देंसाथ में अपना द्वादश नाम रूपी भुषण दें । आप मुझ पर दया करके सुंदर रूप़राम नाम का धऩअध्यात्मिक ज्ञान परमेश्वर का भजन और संतों का सतसंग देने की कृपा करें।