Wednesday, March 14, 2018

सतगुरु भूरीवालों की महिमा न्यारी

एक बार रामगोपाल नाम का एक व्यक्ति था । जिसके लडके का नाम सोमनाथ था । एक दिन वह बच्चा अपनी हमउम्र के बच्चों के साथ खेल रहा था । तभी किसी बच्चे ने उसके पीछे से धक्का दे दिया और वह मुंह के बल गिर गया । गिरने से उसकी जीभ में दांत गढ़ गए, उसकी जीभ का एक तरफ का साथ रहा बाकी सारा कट गया । जीभ लटकने लग गई, खून से उसके कपड़े भीग गए । ऐसी हालत हो गई कि वह कुछ खा भी नहीं सकता था और ना ही कुछ बोल सकता था।

उस समय सर्जरी का इलाज बहुत कम था । डॉक्टर बोले कि जीभ को टांका नहीं लग सकते, अगर लगा भी दिए तो जीव टेढ़ी हो जाएगी और वह कभी नहीं बोल सकेगा। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। बच्चे के पिता रामगोपाल जी उसको कई डॉक्टरों के पास ले कर गए ।
तभी किसी सत्संगी ने बताया कि बहादुरगढ़ के नजदीक श्री छुड़ानी धाम में बन्दीछोड गरीबदास साहिब जी का श्री छतरी सआहिब मंदिर है वहाँ भूरीवाले नाम के एक सिद्ध महापुरुष रहते हैं। लोग कहते हैं कि दुनिया में ऐसा कोई काम नहीं जो छुड़ानी धाम जाकर पूरा नहीं होता हो । रामगोपाल जी बच्चे को लेकर श्री छुड़ानी धाम पहुंच गए। स्वामी भूरीवाले वही पधारे हुए थे, रामगोपाल जी ने बच्चे को बाहर बैठा दिया और स्वयं भूरी वालों की कुटिया में जाकर प्रार्थना की और सारी बात बताई। महाराज भूरीवाले अपनी कुटिया में से निकल कर छतरी साहब के आगे आकर बैठ गए। तभी महाराज जी ने बच्चे को बुलाया और कहा "मुंह खोलो" । बच्चे ने मुंह खोल दिया। महाराज जी ने उसकी कटी हुई जीभ देखी और उसके पिताजी से बोले कि "इसको बंदीछोड़ गरीबदास साहिब जी का प्रसाद खिला दो"। वह बच्चा कई महीने से कुछ भी खा नहीं कहा सकता था ।
किसी तरीके से दूध नाली द्वारा गले में डालते थे। उसको छुड़ानी धाम का भोग का प्रसाद दिया गया, धीरे-धीरे किसी तरह उस बच्चे ने भोग का प्रसाद खाना शुरू किया। भोग का प्रसाद खाते-खाते ही उसकी तकलीफ कम हो गई। तीन-चार दिन में जीभ जुड़ गई और वह पूरी अच्छी तरह से बोलने लग गया। रोटी खाने लग गया। राम गोपाल जी उस दिन से श्री छुड़ानी धाम के, बंदीछोड़ गरीबदास साहिब जी के भूरीवालों के पक्के सेवक बन गए । श्री छुड़ानी धाम का वार्षिक समागम समीप आ गया था। उस समय अपने बच्चे सोमनाथ को लेकर रामगोपाल जी श्री छुड़ानी धाम में पहुँच कर बन्दीछोड़ गरीब दास साहिब जी के दरबार में दंडवत प्रणाम की और फर भुरीवालों के दर्शन करने उनकी कुटियाँ में गए। महाराज जी छोटे-छोटे बच्चों से मंगलाचरण या सतगुरु जी की वाणी का कोई भी श्लोक सुन कर बहुत प्रसन्न होते थे। राम गोपाल जी अपने बच्चे के साथ महाराज जी के दरबार में पहुंचे तब उस समय तकरीबन 5-6 वर्ष का बच्चा सतगुरु भूरीवालों को मंगलाचरण सुना रहा था।
वह बच्चा सोमनाथ, महाराज जी के पास गया उसने प्रणाम किया। तो महाराज जी बोले "बच्चू ! तु भी सतगुरु देव जी की वाणी के बारे में कुछ जानता है। तब बच्चे ने कहा "नहीं जी" । तब सतगुरु जी ने कहा कि "अगले मेले में याद करके अइयो और हमें सुनाना"। वह बच्चा अपने पिताजी के साथ श्री छुड़ानी धाम आया, आते समय रास्ते में अपने पिताजी को कहा कि "मुझे कोई वाणी का श्लोक बताओ, मैं रास्ते में याद करके महाराज भूरी वालों को सुनाऊंगा"। उसके पिता रामगोपाल जी प्रतिदिन सतगुरु जी की वाणी का पाठ करते थे। तब उन्होंने सदगुरुदेव जी की वाणी में एक श्लोक उसे सुनाया
संखों लहर मेहर की ऊपजे, कहर नहीं जहां कोई।
गरीब दास अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई । ।
यह श्लोक उस बच्चे ने रास्ते में खूब रटा । धाम पहुंचकर बंदी छोड़ गरीबदास साहिब जी के दरबार में दंडवत प्रणाम की और फिर भुरीवालों के दर्शन करने के लिए गए। सतगुरु भूरीवालों को दंडवत प्रणाम किया। तब सतगुरु भूरीवालों ने उससे पूछा "क्या वाणी याद करके आया है"। तब बच्चे ने कहा "हां जी"। महाराज जी बोले तो सुना, तब वही श्लोक बोलकर उस बच्चे ने सुनाया। श्लोक को सुनकर महाराज भूरीवाले बहुत प्रसन्न हुए और उस बच्चे को बहुत प्यार व आशीर्वाद दिया। छोटे बच्चों से बन्दीछोड़ गरीबदास साहिब जी की वाणी सुनकर सतगुरु भूरीवाले बहुत प्रसन्न होते थे।

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