Wednesday, November 7, 2018

अगाध रमैंणी प्रसंग


अगाध रमैंणी प्रसंग

एक नाथ संप्रदाय के रामनाथ नाम  के सिद्ध थे जो  योग विद्या के जानकर थे | वह पूरे भारत में भ्रमण करते रहते और जहां भी किसी महापुरुष के बारे में सुनते तो उनकी परीक्षा लेने के लिए उनसे योग साधना के प्रश्न किया करते | सतगुरु गरीबदास जी के यश को सुनकर आप उनकी परीक्षा लेने हेतु छुडानी आए | महाराज जी के दरबार में पहुँचे और “ आदेश” कहकर अभिवादन किया | महाराज जी ने शिष्टाचार पूर्वक सिद्ध जी का आदर सत्कार किया और आसन देकर उचित स्थान पर बिठाया | जलपान के बाद कुशल क्षेम पूछा | उपरन्त सिद्ध जी ने ज्ञान की बाते अराभ कर दीं | महाराज जी और सिद्ध जी के बीच जो ज्ञान की बातें हुई वह महाराज जी की बाणी में “ आगाध रमैंणी” के नाम से संग्रहित हैं | ज्ञान की बातें करते करते सिद्ध जी ने महाराज जी से कहा की आप सुन्न अर्थात तत्व शुन्य की व्याख्या करके बताओ |

 


महाराज जी  ने कहा

ॐ सुन्न धौं औधू, सुन्न कहां से आई | जो भनभी सो गोद खिलाई || १ ||

हे अवधू  ॐ (सत) सुन्न है  | परन्तु पता नहीं तुम्हारी यह सुन्न कहां से आई है | तुम जिस सुन्न का नाम लेते हो, यह तो तुम्हारी कपोल कल्पित है |
अवधू ने कहा तो आप बताइये फिर आप की सत्य सुन्न कैसी है ?

बाजै जोग लहे निज तूरं | पारब्रह्म बानी निज नूरं || २ ||

हे अवधु! उस सुन्न को योग के द्वारा ही जाना जा सकता है | वहां पर बिना किसी के बजाये अनहद धुन हो रही है, जो पारब्रह्म की वाणी है | और  वहां पर पारब्रह्म का नूर जगमगा रहा है |

कौन सुंन कौन की चेली | कौन नाद से रहै अकेली || ३३ ||
कौन सुंन किह जुगते जाई | जाकूँ बूढ़ी कहूँ क तरनी भाई || ४ ||

सतगुरु जी बोले तुम अपनी जिस सुन्न का वर्णन कर रहे हो वह तुम्हारी सुन्न कैसी है ? उसे किस ने प्रकट किया ? उसका कौन से नाद में निवास है ? उस सुन्न का नाम क्या है और उस सुन्न तक कैसे पहुँचा जाता है ?  यह जो आप  की सुन्न है वह कोई नई सुन्न है या पुरातन ?

इस तरह पूछने पर अवधू ने कोई जवाव नहीं दिया तो की

जाका अलख निरंजन पार ना पाया | सो बानी हमरा गुरु ल्याया || ५ ||

महारज जी आगे बोले की यह जो हमारी सुन्न है वह अलख है इसका भेद काल निरंजन भी नहीं जान सकता | हमने अपने सतगुरु के उपदेश से इसे जाना है |

कहौ धौं पारब्रह्म का कौन पसारा | कौन नाद जो सुंन से न्यारा || ६ ||
सुंन सोई जो सुंन में बोले | कौन सुंन की ताली खोल्हे || ७ ||

अवधू बोले – यह तो बताओ की पार ब्रह्म का ठिकाना कौन सा है ? ऐसा कौन सा नाद है  जो  इस पिण्ड और ब्रह्मंड से अलग है  ? इस सुन्न का भेद कौन खोल सकता है ?
इस पर सतगुरु जी बोले की

क्या ताली बिच मारग पईया | छिन में  चेटक लागै भईया || ८ ||
सर्व लोक की माया त्यागे | ममता टूटे गृह बैरागे || ९ ||
दीन दुनी से होइगा न्यारा | सोई पावैगा सुन पसारा || १० ||

सिर्फ भेद जान लेने से क्या लाभ ? यह जो चेटक रुपी  माया है यह फिर से इस भेद को भुला देगी  | जब तक उसे प्राप्त नहीं  किया जाता तब तक कोई लाभ नहीं | इसे पाने के लिए जीव सब से पहले संसार के समस्त पदार्थों का मोह त्यागे | फिर संसार से ममत्व टूट जाने पर उसमे वैराग उत्पन्न होगा | इस तरह वह संसार और संसार के धर्मो से अलग (वीतराग) हो जाएगा | जो ऐसा वीतराग महापुरुष होगा वही इस सत्य सुन्न को प्राप्त कर सकता है | लेकिन इसे प्राप्त करना इनता आसान नहीं है क्यूंकि

पदम जन्म जो ब्रह्मा धारे | तो इस सुंन नाहीं प्रकारे || ११ ||
विष्णु नाम है सत सतेसा | सत सुन्न से नाहीं भेटा || १२ ||
सतानवें बेर शिव शंकर धाया | सत सुंन का मरम न पाया || १३ ||

ब्रह्मा जी ने पदम (एक प्रकार की संख्या ) जन्मों तक प्रयत्न किया लेकिन इस सुन्न को प्राप्त नहीं कर सके | लोग भगवान विष्णु के नाम को नौका की तरह इस संसार सागर से पार उतारने वाला मानते है | लेकिन वह विष्णु भी इस सुन्न को प्राप्त नहीं हुए | शंकर भगवन ने सतानवे (७९) बार प्रयत्न किया लेकिन इस सुन्न का मर्म नहीं जान सके | क्योंकि

जैसे बटक बीज में बड़की छांहीं | ऐसे गुण इन्द्री मन मांहीं || १४ ||

जैसे वट वृक्ष के बीज में  पूरा वट वृक्ष समाया हुआ होता है ऐसे ही मन  यानि  अंत: करण में सभी इन्द्रियों के विषय सूक्ष्म रूप से समाए रहते हैं | जिसके कारण मन सत्य सुन्न की तरफ नहीं जा पाता | लेकिन

शब्द अतीत सिंध की सैली | मिटे बुदबुदा फ़ोकट फैली || १५ ||

मन वाणी से परे जो शब्द ब्रह्म का मार्ग है उसे सुरति निरति के द्वारा जाना जा सकता है और जीव सत्य सुन्न तक पहुंच सकता है | इसे जान लेने के बाद माया का यह संसार पानी के बुदबुदे की तरह छन भंगुर प्रतीत होता है |
महाराज जी का उपदेश सुनने पर अवधू जी के मन में शंका उपस्थित हुई की क्या यह शब्द ब्रह्म पिण्ड ब्रह्मंड से न्यारा है या इसी में विलीन है ? जिसका निराकरण महाराज जी ने अगली पंक्ति में किया | की

क्या न्यारा क्या मध्य बताऊँ | ---

सतगुरु जी बोले की अलग या मध्य कैसे कहूँ वह तो सर्व व्यापक है |

---सुकृत नाम कौन विधि पाऊँ || १६ ||

इस पर अवधू जी ने कहा की इस सुकृत नाम को मैं कैसे प्राप्त कर सकता हूँ |


सुकृत नाम सुरति की डोरी | निरति निरालंब पुरुष किसोरी || १७ ||

महाराज जी ने कहा की वह पतित पावन सुकृत निज नाम है और सुरति निरति के द्वारा उसकी साधना की जाती है|  तब जाकर निरालंब अविगत ब्रह्म की प्राप्ति होती है |

अवधू ने कहा महाराज जी सुन्न कितनी प्रकार की है ?

सकल सुंन, महा सुंन, अभै सुंन, अलील सुंन, अजोख सुंन, सार सुंन, सत सुंन || १८ ||

महाराज जी ने कहा की १. सकल सुंन, २. महा सुंन, ३. अभै सुंन, ४. अलील सुंन, ५. अजोख सुंन, ६. सार सुंन और ७. सत सुंन | यह सात प्रकार की सुन्न हैं |
अवधू जी ने आगे पूछा की क्या सभी सुन्न में सत पुरुष स्वयं विराजमान है ? क्या वहां पर कोई महापुरुष पहुँचा है ? वह स्थान कैसा है और उसकी क्या निशानी है ?

गरीब, सत सुंन  में सत है, और  सुंन प्रकाश |
जहां कबीरा  मठ रच्या, कोई पौंहचे बिरला दास || १९ ||
सेत गुमट की सेव है, ज्यूं कुंजी के बैंन |
दास गरीब जहां रत्ते, तहां पाया सुख चैंन || २० ||

सतगुरु जी बोले की सत पुरुष तो सत सुन्न में ही विराजमान है बाकि सभी सुन्न में उनका प्रकाश विद्यमान है |  वहां पर कबीर साहिब जी विशेष रूप से विद्यमान हैं | कोई विरला ही साधक वहां पर पहुंच सकता है | उस सुन्न में श्वेत गुम्बज है वहीँ  पर सत पुरुष का  निवास है | महाराज जी बोले की  हम सदा उसी में तल्लीन रहते है | वहीँ पर परम आनंद है |

नाथ जी सतगुरु गरिब दास जी  के उत्तरों से संतुष्ट हो गये और प्रेम पूर्वक नमस्कार करके वहां से चले गए | 

|| सत साहिब ||

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