Friday, June 9, 2017

कबीर जी का जीवन परिचय



कबीर जी का जीवन परिचय

सतगुरु बन्दिछोड़ कबीर साहिब जी का अवतरण ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरुप अधंकारमय हो रहा था। भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक अवस्था बहुत ही विकट हो गयी थी। जनता एक तरफ मुसलमान शासकों की धर्मांधता से त्राहि- त्राहि कर रही थी और दूसरी तरफ हिंदूओं के कर्मकांडों, विधानों एवं पाखंडों से धर्म का ह्रास हो रहा था। भक्ति- भावनाओं का सम्यक प्रचार नहीं हो रहा था। सिद्धों के पाखंडपूर्ण वचन, समाज में वासना को आश्रय  दे रहे थे।

नाथपंथियों के अलखनिरंजन में लोगों का हृदय रम नहीं रहा था। ज्ञान और भक्ति दोनों तत्व केवल ऊपर के कुछ धनी, पढ़े- लिखे की बपौती के रुप में दिखाई दे रहा था। ऐसे नाजुक समय में सतगुरु बन्दिछोड़ कबीर साहिब जी का अवतरण हुआ | आप जी ने राम और रहीम के नाम पर आज्ञानतावश लड़ने वाले लोगों को सच्चा मार्ग  दिखाया । आप जी ने सभी धर्मो का समन्वय करके सत्य और श्रेष्ठ मार्ग को प्रकट किया |

कबीर साहिब जी को सिर्फ एक संत या महापुरुष या महात्मा या भक्त या योगी मान लेना उचित नहीं होगा क्यूंकि वह पारब्रह्म परमेश्वर के ही अवतार थे | कबीर जी  इन सभी के गुण से युक्त थे | कबीर जी स्वयं सिद्ध थे | बाल्यकाल से ही आप में अलौकिक एवं अद्भुत शक्तियाँ और सिद्धियाँ देखी गई थीं | सभी संतों महापुरषों ने आप जी को पारब्रह्म परमेश्वर का अवतार माना है | भविष्यपुराण भी इस बात की पुष्टि करता है की  कबीर जी पार ब्रह्म परमेश्वर के अवतार थे | यथा

भारते यंवानाक्रान्ते निर्देष्टु सत्पथं नणाम् |
हरि: कबीर नाम्ना हि कलाव तरिष्यति ||
बंधनाज्जाति भेदादेरून्मोक्तुं नन्न् कलौ किल |
वक्तुं तत्त्वं कबीर : सन् पद्मे प्रादुर्भविष्याति || १ ||
अर्थात कलियुग में जिस समय भारत वर्ष यवनों (मुसलमानों) से आक्रांत हो जायेगा उस समय मनुष्यों को सन्मार्ग का निर्देश करने के लिए साक्षात् भगवान हरि कबीर नाम से कमल पत्र के अंदर अवतरित होंगे | और जात पात, वर्ण आश्रम के बन्धनों से मुक्त करके,  भेद भाव को समाप्त करने के लिए परम तत्व का उपदेश करेंगे |
कलौ निर्गुणब्रहह्मैव कबीर दासना मत: |
अवतारन्निर्गुणास्य मार्गस्य दर्शक: || २ ||
कलियुग में निर्गुण ब्रह्म ने ही कबीर नाम से अवतार धारण किया | जिन्होंने निर्गुण भक्ति के द्वारा परम धाम का मार्ग दिखाया |

गुणातीतं निराकार निर्विकारं परात्परम |
रामं भजे कबिरोऽसौ नो दाशरथ रूपकम् || ३ ||
कबीर जी ने गुणातीत, निराकार, निर्विकार, सब से श्रेष्ठ राम का भजन किया | किन्तु उन्होंने दशरथ पुत्र राम का भजन कभी नहीं किया |

निर्गुणं ब्रह्म्परमं स्वभक्ताऽभीष्ट  सिद्धये |
अवतारति लोकेऽस्मिन् यथा कालं युगे – युगे || ४ ||

निर्गुण  पर ब्रह्म अपने भक्तों की इष्ट सिद्धि के लिए देश काल के अनुसार हर युग में अवतार धारण करते हैं |

  
अवतरण
चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए।
जेठ सुदी बरसायत को पूरनमासी तिथि प्रगट भए॥
घन गरजें दामिनि दमके बूँदे बरषें झर लाग गए।
लहर तलाब में कमल खिले तहँ कबीर भानु प्रगट भए॥[1]
संवत् चौदह सौ पचपन (१४५५) विक्रमी ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवार के दिन, एक प्रकाश रुप में सत्य पुरुष काशी के "लहर तारा'' (लहर तालाब) में उतरे। उस समय पृथ्वी और आकाश प्रकाशित हो गया। समस्त तालाब प्रकाश से जगमगा गया। हर तरफ प्रकाश- ही- प्रकाश दिखने लगा, फिर वह प्रकाश तालाब में ठहर सा गया। उस समय तालाब पर बैठे अष्टानंद वैष्णव दिव्य प्रकाश को देखकर आश्चर्य- चकित हो गये। उस प्रकाश ने जल के ऊपर कमल- पुष्प पर एक बच्चे का रूप धारण कर लिया |अष्टानंद जी ने यह सारी बातें स्वामी रामानंद जी को बतलायी, तो स्वामी जी ने कहा की वह प्रकाश एक ऐसा प्रकाश है, जिसका फल शीघ्र ही तुमको देखने और सुनने को मिलेगा तथा देखना, उसकी धूम मच जाएगी।
गरीब अनंत कोटि ब्रह्मंड में, बंदी छोड कहाय |
सो तो एक कबीर हैं, जननी जन्या न माय ||

सुबह को जब नीमा और नीरू नामक मुसलमान दम्पति उस तलब पर आए तो उन्होंने देखा की कमल के पुष्प पर एक तेजस्वी बालक पड़ा है तो उन्होंने उसे उठा कर बड़े प्रेम से मुख चूमा और अपने घर ले आए | जब काशी के लोगों को पता लगा  तो सभी बालक के दर्शन के लिए आने लगे | लोग ही नहीं देवी, देवता और ईश्वर तक दर्शन के लिए आए | बालक के तेज को देख कर आम लोग कहने लगे यह तो कोई देवता है | देवता कहने लगे यह तो ईश्वर है | और ईश्वर एक उठे यह तो परब्रह्म है | भगवान शिव जी बालक के दर्शन के लिए आए | बालक को गोद में लेकर अपने ईश को प्रणाम किया और पिता को कुंवारी गाय लाने के लिए कहा और उस गाय को दुह कर दूध निकाला और बालक कबीर को पिलाया |
काजी कुरान लेकर बच्चे का नाम रखने के लिए आये तो हर एक अक्षर कबीर में बदल गया और इस तरह बालक का नाम कबीर रखा गया |
कबीर जी के गुरु
कबीर जी ने अपनी वाणी में गुरु को बहुत ऊँचा स्थान दिया है | गुरु की बहुत महिमा गाई है | वैसे तो आप स्वयं पारब्रह्म के अवतार थे पर गुरु शिष्य की मर्यादा को अधिक मजबूत करने के लिए आप ने रामानंद जी को गुरु बनाया | रामानंद जी एक वैष्णव संत थे | योग प्राणायाम के द्वारा अपने शरीर पर विजय पा चुके थे | काशी के महापुरुषों में आप का स्थान सब से ऊँचा था | जग मर्यादा के कारण कबीर जी रामानंद जी को गुरु बनाना चाहते थे लेकिन उन्हें पता था की रामानंद जी कभी भी एक मुसलमान को अपना शिष्य नहीं बनाएंगे | इसलिए उन्होंने एक युक्ति की | जब कबीर जी पांच वर्ष के हो गए तो, जिस घाट  पर रामानंद जी सुबह सुबह स्नान को जाते थे उस घाट की सीढ़ियों पर लेट गए | स्नान करके लौटते समय रामानंद जी के पाँव की ठोकर कबीर जी को लगी और रामानंद जी ने मुख से राम राम कह दिया | बस इसी को गुरु मन्त्र मानकर कबीर जी भक्ति करने लगे और रामानंद जी को गुरु मानने लगे |
कबीर जी का परिवार
कबीर जी का जन्म दिव्य था | उनका लालन पोषण नीमा और नीरू जी ने किया | कबीर जी की पत्नी का नाम लोई था | पुत्र का नाम कमाल और पुत्री का नाम कमाली था |
कबीर जी का कपड़ा बुनने का  कम करते थे | आप जी ने अपनी जाति जुलाहा कहि है
"जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरो उदासी।'
 
कबीर जी के घर में रात- दिन साधू संतों, मुडियों का जमघट रहने से बच्चों को रोटी तक मिलना कठिन हो जाता था।
कबीर जी की वाणी
कबीर जी की वांणी बहुरंगी है। कबीर जी ने किसी ग्रन्थ की रचना नही की। उनके पश्चात उनके शिष्यों ने उनके उपदेशों का संकलन किया जो बीजकनाम से जाना जाता है। इस ग्रन्थ के तीन भाग हैं, ‘साखी’, ‘सबदऔर रमैनी। कबीर के उपदेशों में जीवन की दार्शनिकता की झलक दिखती है।
गुरू-महिमा, ईश्वर महिमा, सतसंग महिमा और माया का फेर आदि का सुन्दर वर्णन मिलता है। उनके काव्य में यमक, उत्प्रेक्षा, रूपक, अनुप्रास आदि अलंकारों का सुन्दर समावेश दिखता है।

जीव हिंसा न करने और मांसाहार के पीछे कबीर का तर्क बहुत महत्वपूर्ण है। वे मानते हैं कि दया, हिंसा और प्रेम का मार्ग एक है। यदि हम किसी भी तरह की तृष्णां और लालसा पूरी करने के लिये हिंसा करेंगे तो, घृणां और हिंसा का ही जन्म होगा। बेजुबान जानवर के प्रति या मानव का शोषण करने वाले व्यक्ति कबीर के लिये सदैव निंदनीय थे।
कबीर की साखियों में सच्चे गुरू का ज्ञान मिलता है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि कबीर के काव्य का सर्वाधिक महत्व धार्मिक एवं सामाजिक एकता और भक्ती का संदेश देने में है।
उनकी महान रचना बीजक में कविताओं की भरमार है जो कबीर के धार्मिकता पर सामान्य विचार को स्पष्ट करता है। कबीर की हिन्दी उनके दर्शन की तरह ही सरल और प्राकृत थी। वो ईश्वर में एकात्मकता का अनुसरण करते थे। वो हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा के घोर विरोधी थे और भक्ति तथा सूफ़ी विचारों में पूरा भरोसा दिखाते थे।
कबीर जी सैकड़ो पोथियाँ (पुस्तकें) पढ़ने के बजाय वे प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ने को श्रेष्ठ कहा |
कबीर का मूल मंत्र था,
मैं कहता आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखिन

अवसान

आजीवन काशी में रहने के बावजूद अन्त समय सन् 1518 के करीब मगहर चले गये, क्योंकि वे कुछ भ्रान्तियों को दूर करना चाहते थे। उस समय ऐसी अवधारणा थी की काशी में मरने से स्वर्ग मिलता है तथा मगहर में मृत्यु पर नरक। उनकी मृत्यु के पश्चात हिन्दु अपने धर्म के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे और मुसलमान अपने धर्मानुसार विवाद की स्थिती में एक अजीब घटना घटी उनके पार्थिव शरीर पर से चादर हट गई और वहाँ कुछ फूल पङे थे जिसे दोनों समुदायों ने आपस में बाँट लिया।
गरीब सेवक होय कर ऊतरे, इस पृथ्वी के मांहि |
जिव उधारन जगतगुरु, बार बार बलि जांहि ||
|| सत साहिब ||

No comments:

Post a Comment