Sunday, July 11, 2010

आचार्य श्री गरीब दास जी महाराज का जीवन परिचय

आचार्य श्री गरीब दास जी महाराज का जीवन परिचय
सतगुरु संत और अवतार तीन कला एके दरबार
जगतगुरु आचार्य श्री गरीबदास महाराज जी का अवतार इस कलयुग में भटक चुके लोगों को परमेश्वर प्राप्ति का सही मार्ग दिखाने के लिये छुडानी में हुआ आप कबीर पंथ के महान संत, महान योगी, महान कवी हुए आप जी की इस जगत को सब से बड़ी देन आप जी की पवित्र वाणी है जो की “श्री ग्रन्थ साहिब” के नाम से प्रचलित है इसमे आप जी ने लगभग १८०० दोहों की रचना की है इतनी बड़ी मात्र में विभिन्न भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करते हुए शायद ही किसी महापुरुष ने वाणी की रचना की हो आप की पवित्र वाणी को पढ- सुनकर, विचारकर ना जाने कितने ही जीवों का उद्धार हो चूका है और आगे भी होता रहेगा जहां एक तरफ आप ने परमेश्वर प्राप्ति के लिये नाम स्मरण, भक्ति और ज्ञान मार्ग का उपदेश दिया वहीं दूसरी तरफ समाज में फैली बुराइयों का जम कर विरोध भी किया आप हिंदू मुसलिम सब को एक सामान, उस एक परमात्मा की संतान मानते थे
आप हमेशा तुरिया अवस्था में लीन रहते थे और आप जी के श्री मुख से सहज ही वाणी प्रकट होती रहती थी
आप जी से ही गरीब दासी पंथ की शुरुवात हुई जो आज भारत के अनेक राज्यों में पसर चूका है

आप जी का अवतार स्थान श्री छुडानी धाम गरीब दासी संप्रदाय का सर्वोच्च पीठ है जहां पर आप जी की याद में भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है यहाँ पर –
१. हर वर्ष वैशाख की पूर्णिमा को जगतगुरु आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज का अवतार दिवस बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है
२. कबीर साहिब जी द्वारा गरीब दास जी को गुरु दीक्षा देने वाले दिन की याद में हर वर्ष फाल्गुन शुद्धि द्वादशी को छुडानी धाम में कृपा पर्व बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है यह परम्परा महाराज श्री गरीब दास जी के समय से ही चली आ रही है
३. हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल द्वितीय को आप जी की बरसी (निर्वाण दिवस) मनाई जाती है

ऐसे महान अवतारी पुरुष का संक्षिप्त जीवन परिचय नीचे दे रहे हैं

प्राकट्य (जन्म)
आचार्य श्री गरीबदास जी का जन्म हरियाणा प्रान्त के जिल्हा झज्जर , तहसील बहादुरगढ के गाँव छुडानी में विक्रमी संमत १७७४ (ई. सन १७१७) की वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को, मंगलबार के दिन, सूर्योदय से दो महूर्त पहले, अभिजीत नक्षत्र में, क्षत्रिय कुल में, जाट जाती के धनखड गोत्र में पिता श्री बलराम जी के घर सुभागी माता श्रीमती राणी जी की पवित्र कोख से हुआ
छुडानी महाराज जी के नाना का गाँव था आप जी के नाना श्री शिवलाल जी के लड़कियों की ही संतान थी कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने श्री बलराम जी को अपना घर जवाई बनाया तथा अपनी सारी जमीन जायदात उन्हें दी बलराम जी का अपना गाँव करौंथा था

बचपन
आचार्य श्री गरीबदास जी बचपन से ही प्रभु भक्ति में लीन रहते थे आप बचपन से ही बच्चों, बूढों को सद उपदेश देते थे जिस को सुन कर लोग हैरान रह जाते थे आप बचपन में अपने मित्रों के साथ गाय चराने जाते, गौओं को चरने के लिये छोड़ आप किसी पेड के नीचे बैठकर ध्यान में मग्न हो जाते
आपने किसी प्रकार की कोई सांसारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की, लेकिन फिर भी बहुत ही मन मोहक वाणी की रचना की है

सतगुरु श्री कबीर साहिब जी से भेंट तथा गुरु दीक्षा

जब आप की आयु १० वर्ष की थी तो फाल्गुन शुद्धि द्वादशी वि.स. १७८४ (सन १७२) के दिन आप बच्चों के साथ नाना जी के खेत में गौयें चरा रहे थे तो कबीर साहिब जी महाराज सब के सामने प्रकट हुए
कबीर जी ने बच्चों से कुछ बातें की फिर बच्चे कबीर जी से दूध पिने का आग्रह करने लगे कबीर साहिब जी ने कहा की मैं दूध तो जरुर पियूँगा लेकिन कंवारी गाय (बछिया) का इस बात पर सभी बच्चे हँसने लगे लेकिन गरीबदास जी एक बछिया ले आए कबीर जी ने बछिया की कमर पर हाथ रखा तो उस के स्तनों से दूध के धाराएँ बहने लगी गरीब दास जी ने एक बर्तन में दूध ले कर कबीर साहिब जी को दिया कबीर जी ने उस में से आधा दूध पिया और बाकी का दूध बच्चों को पिने को कहा सभी ने शंका वश हो कर दूध पिने से मना कर दिया लेकिन गरीबदास जी ने श्रद्धा के साथ दूध पी लीया दूध पिने के बाद श्री गरीब दास जी बेशुद्ध से हो गए उन्हें कबीर जी अपने साथ सतलोक ले गए बच्चों ने जब गरीब दास जी के शरीर को हिलाया तो वह गिर पडे उन्हें मरा हुआ समझ कर बच्चे भागे भागे माता पिता के पास गए और सारी कहानी कह सुनाई माता पिता अत्यंत दुखी हुए, जा कर देखा तो शरीर में कोई हलचल नहीं थी जीवित होने का कोई लक्षण नहीं दिखा तो सब ने निश्चय किया की मर चूका है शरीर को ले जाकर चिता पर रखा और आग देने लगे तो श्री गरीबदास जी उठ कर बैठ गए और अपने मुख से वाणी का उच्चार करने लगे सभी आश्चर्य चकित हो कर खुशियाँ मनाने लगे महारज जी वाणी में कबीर जी से मिलने का उल्लेख करते हैं की

अलल पंख अनुराग है, सुन्न मंडल रहे थीर
दास गरीब उधारया, सतगुरु मिले कबीर


इस दिन के बाद श्रीं गरीबदास जी हमेशा वाणी का उच्चारण करते रहते थे माता पिता को लगा की बच्चे के दिमाग पर कोई असर हो गया है गरीब दास जी की बातें लोगों को समझ नहीं आ रही थी एक दिन एक विद्वान पंडित को दिखाया, पंडित ने जब गरीब दास जी के मुख से वाणी सुनि तो वह समझ गया की यह कोई साधारण बालक नहीं बल्कि कोई महान अवतारी पुरुष हैं उसने लोगों को बताया की यह बालक जिस वाणी का उच्चारण कर रहा है वह वेदों का सार है यह बालक महापुरुष है

विवाह तथा संतान
आप जी का विवाह बरौना गाँव के चौधरी नादर सिंह दहिया की सुपुत्री मोहिनी देवी से हुआ
आप के चार पुत्र तथा दो पुत्रियां उत्पन्न हुईं

चार पुत्र
१. जैतराम – आप पहले गृहस्थ रहे और पुत्र होने के पश्चात सन्यास लेकर नागा साधुओं की तरह जीवन व्यतीत करते हुए करौंथा में जा कर रहने लगे आप ने मह्न्तपुर (जलंधर) में अपना शरीर त्यागा
२. तुरतीराम – आप जी को महाराज जी की गद्दी का उतराधिकारी बनाया गया आप ४० वर्ष तक गद्दी पर आसीन रहे और सन १८१७ को शरीर त्यागा
वर्तमान में श्री महंत दयासागर जी आचार्य श्री गरीबदास जी की गद्दी पर विराजमान हैं
३. अंगदराय –
४. आसाराम –

दो पुत्रियां
१. दिलकौर २. ज्ञानकौर
आप दोनों ने पूरी उम्र विवाह नहीं किया और पूरा जीवन ब्रह्मचर्यमय जीते हुए जीवन मुक्ति का आनंद प्राप्त किया

वाणी रचना (ग्रन्थ रचना)सतगुरु श्री कबीर साहिब जी से गुरु दीक्षा के बाद से ही महाराज श्री गरीब दास जी वाणी उच्चारण करने लगे थे आप के शिष्य और सेवक आप की वाणी को कंठस्थ कर लेते और जहां तहां गाया करते धीरे धीरे आप की वाणी के चर्चे चारों तरफ होने लगे दादू संप्रदाय के संत गोपाल दास जी ने राजस्थान में आचार्य जी की वाणी सुनि तो उन के मन में आचार्य जी के दर्शन करने की अभिलाषा हुई कुछ दिनों बाद छुडानी में आकर आचार्य जी के दर्शन करके अति प्रसन्न हुए आचार्य जी से आपने अनेकों गुढ़ प्रश्न किये जिनका उत्तर आचार्य जी ने सरल शब्दों में वाणी उच्चारण करते हुए दिया इन उत्तरों को सुन कर गोपालदास जी संतुष्ट हुए
आचार्य जी की वाणी से प्रभावित हो कर गोपालदास जी ने महाराज जी से अनुरोध किया की आपकी वाणी अमूल्य रत्नों के समान है इससे अनेक जीवों का कल्याण हो सकता है अगर आप की अनुमति हो तो मैं इसे लिख लेता हूं आचार्य जी ने अनुमति दे दी वाणी लिखने के लिये बेरी के बाग में जंड के पेड के नीचे वाले स्थान को निश्चित किया गया विक्रमी संवत १७९७ फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी को वाणी लिखना शुरू किया गया
जिस जंड के पेड के नीचे बैठ कर वाणी की रचना की गई वह पेड अब नष्ट हो चूका है लेकिन उस जगह को याद के तौर पर सुरक्षित रखा गया है

आचार्य श्री गरीब दास जी द्वारा रचित वाणी की संख्या अलग अलग लोगों द्वारा अलग अलग बताई गई है आप जी ने लगभग १८०० वाणी की रचना की है

आचार्य जी की वाणी बहुत ही रस भरी और सरल है जो भी इसे सुनता है उसे एक प्रकार के आनंद, लय, खिचाव की अनुभूति होती है वाणी की मुख्य भाषा हिंदी है सतगुरु जी की वाणी में अन्य कई भाषाओँ के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है मुख्यता हरयाणवी, मारवाड़ी, गुजरती, पंजाबी, बिहारी, उर्दू, अरबी और फारसी शब्दों का प्रयोग हुआ है शास्त्रीय शब्दों का प्रयोग भी काफी किया गाया है इन के इलावा अन्य कई प्रान्तों की भाषाओँ के शब्द भी पाए जाते हैं

आप जी द्वारा रचित ग्रन्थ साहिब को ४ भागों में बनता गाया है
१. अंग भाग २. ग्रन्थ भाग ३. पद भाग ४. राग भाग

जगतगुरु आचार्य श्री गरीब दास महाराज जी की वाणी का संक्षिप्त परिचय तथा उपदेश

आप जी ने अपनी वाणी में अध्यातम जगत के प्रत्येक पहलु को छुआ है आप जी की वाणी समस्त वेदों और पुराणों का सार है वाणी के द्वारा नवदा भगति, राज योग, शब्द सुरति योग, द्वैत - अद्वैत वाद, सृष्टि रचना, गुरु महिमा, नाम की महिमा, भक्ति मार्ग, सतलोक वर्णन, परमेश्वर के निर्गुण सगुण भेद, काल और माया का स्वरुप, ब्रह्म निरूपण इ. अनेक विषयों को सुन्दर ढंग से काव्यमय रूप में प्रस्तुत किया है अनेको भगतों की कथा, सतगुरु कबीर साहिब जी महिमा का सुन्दर वर्णन किया है मुख्यत: वाणी में राजयोग, ज्ञानयोग और संत मत के शब्द सुरति योग का बहुत स्थानों पर खुल कर वर्णन किया गया है
आचार्य जी ने अपने समय में धर्म के नाम पर चल रहे पाखंडों का कड़वे शब्दों में खंडन किया नशाखोरी तथा अन्य सामाजिक बुराइयों का विरोध किया है आप की वाणी जात पात रहित आपसी भाईचारा, अहिंसा, त्याग, संयम्, क्षमा और निर्लोभता जैसे गुणों को धारण करने का उपदेश देती है
आप जी का उपदेश हिंदू और मुसलमान दोनों को एक जैसा होता था जहां आप हिंदुओं को सच्चे हिंदू धर्म का उपदेश देते वहीं मुसलमान को सही इस्लाम धर्म का उपदेश देते आप जी की नजर में हिंदू और मुसलिम सब परमेश्वर की संतान हैं आप जी वाणी में कहते हैं

कैसे हिंदू तुर्क कहाया , सब ही एकै द्वारे आया
कैसे ब्राह्मण कैसे सुदा, एकै हाड चाम तन गुदा
एकै बिन्द एके भग द्वारा, एकै सब घट बोलन हारा
कौम छतीस एक ही जाती, ब्रह्म बीज सब की उतपाती
एकै कुल एकै परिवारा, ब्रह्म बीज का सकल पसारा
ऊँच नीच इस विधि है लोई, कर्म कुकर्म कहावे दोई
गरीब दास जिन नाम पिछान्या, ऊँच नीच पदवी प्रवाना


आप मांसाहार, मदिरापान और तम्बाखू सेवन इ. जैसी बुराइयों के सख्त खिलाफ थे आप जी वाणी में फरमाते हैं
अथ मांस मदिरा निषेध

सुरापान मद्य मांसाहारी, गमन करे भोगे पर नारी
सत्तर जन्म कटत है शीश, साक्षी साहिब है जगदीश
पर द्वारा स्त्री का खोल्हे, सत्तर जन्म अंध होए डोले
मदिरा पीवै कड़वा पानी, सत्तर जन्म श्वान कै जानी
झोटे बकरे मुर्गे ताई, लेखा सब ही लेट गुसांई
मुरग मोर मारे मेहमंता, अचराचर हैं जीव अनंता
जिव्हा स्वाद जो हिते प्राना, नीमा नाश गया हम जाना
तीतर लवा बुटेरी चिड़िया, खुनी मारे बड़े अंगडीया
अदले बदले लेखे लेखा, समझ देख सुन ज्ञान विवेका
ज्यूँ मुहमद सिर बिसमल लाई, जिव्हा स्वादी हते कसाई

आचार्य जी सब जीवों पर दया करने का उपदेश देते हैं
गरीब शब्द हमारा मानियो, और सुनते हो नर नार
जीव दया बिन कुफुर है, चले जमाना हार

और
दया धर्म का मूल है
इत्यादी ...

अन्नदान को बहुत महत्त्व दिया गाया है इसीलिए गरीब दासी सम्परदायों में मुफ्त अन्न दान किया जाता है क्योंकि
अन्न समान देव नाही दूजा, साहिब चरण कमल की पुजा

अन्न ही प्राण पुरुष आधारं, अन्न से खुल्हे ब्रह्म द्वारं
आप जी ने सुमिरन, और सतसंग पर विशेष जोर दिया है जैसे
गरीब आध घडी आध घडी, आध घडी की आधि
साधों सेती गोष्टी, जो कीजे सो लाभ
गरीब पाव घडी तो याद कर, नीमा नाश न होय
सतगुरु हेला देत है, विषय शूल नहीं बोय
और
गरीब सुमिरन तब ही जानिये, जब रोम रोम धुन होय
कुंज कमल में बैठ कर, माला फेरे सोय
और जब सुमिरन चल पडता है तो , लिव लग जाती है तो
गरीब लै लगी तब जानिये, जग से रहे उदास
नाम रटे निरभै कला, हार दम हिरा श्वास


महाराज जी कहते हैं की सिर्फ राम का नाम लेने से ही काम नहीं चलेगा साथ में विश्वास होना भी जरुरी है
गरीब राम कह्या तो क्या हुआ, उर में नहीं यकीन
चोर मुसे घर लुट ही, पांच पचीसों तीन

और जिन के अंदर लगन है, विश्वास है, वह
गरीब जिन के अंदर लगन है, जोर कहेंगे राम
बका बकाई करत हैं, आन झके बेकाम


ऐसे लोगों के लिये सब जगह एक ही परमेश्वर रम रहा है
गरीब एक राम कहन्ते राम है, जिन के दिल है एक
बाहर भीतर रम रह्या, पूर्ण ब्रह्म अलेख

सुमिरन के साथ आप ज्ञान का होना भी बहुत जरुरी मानते हैं क्यों की जिस का सुमिरन करना है अगर उस के बारे में पता ही ना हो तो फिर बात नहीं बनती
गरीब ज्ञान विचार विवेक बिन, क्या मुख बोलै राम
सर्प बजावे बाबई, रते न निर्गुण नाम

गरीब करै विचार समझ करि, खोज बुझ का खेल
बिना मथे निकसे नहिं, है तिल अंदर तेल
गरीब विचार नाम है समझ का, समझ ना परी परख
अकल मंद एके घना, बिना अकल क्या लख

मती देंदी बालम अंधे नु, चतुर विवेकी शब्द पिछाने, क्या समझावे खंड नु

निश्चय को आप ने सब से उपर माना है
गरीब निश्चय उपर नाम क्या, कहाँ ध्यान कहाँ ज्ञान
निश्चय खेत निपाईया, कांकर बोई जान

तथा भक्ति हीन ज्ञान, ध्यान, निश्चय और सुमिरन सब बेकार है जैसे
गरीब भक्ति बिना क्या होत है, भरम रह्या संसार
रत्ती कंचन पाया नहिं, रावण चलती बार

साथ ही सेवा भाव और दान के महत्व को भी दर्शाया है
गरीब बिन इच्छा जो देत है, सो दान कहावे
फल बांछे नहिं तास का, सुरगापुर जावे

दान देने वाले का सत् कर्मी होना जरुरी है
दान मेर छाडे नहिं, करण तुडाये दंत

आप जी के अनुसार परमेश्वर निर्गुण निराकार है यथा
निराकार निरविषम, काल जाल भय भंजनं
निरलेपम निज निर्गुणं, अकल अनूप बेसुन्न धुन्न ३
सोहं सुरति समापतं, सकल समाना निरतले
उजल हिरम्बर हरदमं, बे प्रवाह अथाह है, वार पार नहीं मध्यतं ४

तथा

मूल मन्त्र
निरंजन निरंजन निराकार भज रे
ताता न सीरा, राता न पीरा, धरो ध्यान धीरा रह्या आप थीर रे १
अडोलम् अबोलम् अछेदम् अभेदम् , परे से परे रे कहो कौंन हेरे
अगम अथाह दरिया, गया तू बिसर रे २
बिना मूल मौला, जो काला न धौला
सुरति सिंध सैल , करो दूर फैलम, भजो क्यों न हरि रे ३

और उस परमेश्वर की खोज अपने अंदर ही करनी चाहिए बाहर भटक कर हानी ही होती है
गरीब दिल के अंदर देहरा, जा देवल में देव
हरदम साक्षीभूत है, करो तास की सेव

आचार्य जी के शरीर का स्वरुप
जैतराम जी के अनुसार आप जी का रंग गोरा, केश घुंगराले, कंठ शंख के समान, नाक तोते के समान तथा कान सूप के समान थे छाती चौड़ी, बृषभ के समान कंधे थे, भुजाएँ घुटनों से नीचे तक , नाभि लंबी और गहरी थी सफ़ेद नाख़ून लालिमा लिये हुए, मोतियों जैसे चमकीले दांत और मस्तक चंद्रमा जैसा था ऊंचाई मध्यम थी

निर्वाण
वि. सं . १८३५ भाद्रपद शुक्ल द्वितीय को आप अपना पंच भौतिक शरीर त्याग कर सतलोक धाम को चले गए आप जी के पंच भौतिक शरीर को छुडानी में दफन किया गया और वहाँ पर आप जी याद में एक भव्य मंदिर का निर्माण किया गया है
शिष्य परम्परा
आप जी से २ धाराएँ प्रचलित हुई

१. बिंदी – इसमें आप जी के वंश में से उतराधिकारी चुना जाता है वर्तमान में श्री महंत दयासागर जी गद्दी नशीन हैं
२. नादी – इस में अनेकों संत महापुरुष हुए जिन्होंने गरीब दासी संप्रदाय का प्रचार अनेकों राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, यु.पी , ऍम.पी, बिहार तथा बंगाल में किया वर्तमान में वेधांत आचार्य स्वामी चेतना नन्द जी भुरिवाले जी गद्दी नशीन हैं

गरीब दासी संप्रदाय
वर्तमान में गरीब दासी सम्प्रदाय उत्तर भारत, गुजरात, राजस्थान और पंजाब में फैला हुआ है इस सम्प्रदाय में महाराज भुरीवाले और दयालु दास जैसे अनेकों महान संत हुए हैं, जिन के द्वारा करोडों जीवों का उद्धार हुआ है
आचार्य श्री गरीबदास महाराज द्वारा किये कुछ चमत्कार
आचार्य जी ने अपने जीवन काल में अनेकों ही चमत्कार किये सभी का वर्णन कर पाना तो मुश्किल है लेकिन कुछ एक का वर्णन यहाँ पर कर रहे हैं
१. एक समय बचपन में जब आप गाय चराने गए तो किसी पेड के नीचे बैठ कर ध्यान मग्न हो गए और गौए दूसरों का पूरा खेत चर गई और फसल नष्ट कर दी खेत के मालिकों को जब फसल को बर्बाद देखा तो गुस्से से भरकर गरीबदास जी के माता पिता के पास शिकायत करने लगे खेत वालों के कहने पर जब माता पिता नष्ट किये हुए खेत देखने गए तो खेतों में फसल लहर रही थी खेतों के मालिक यह चमत्कार देखकर आश्चर्य चकित रह गए
२. एक समय एक युवती गाँव में रहती थी वह जंगल से गुजर रही थी तो एक डाकू ने उसे अकेला जान कर घेर लिया वह युवती मन में भगवान से अरदास करने लगी की हे परमेश्वर मेरी रक्षा कीजिये इस पर आचार्य गरीब दास जी महाराज वहाँ पर घोड़े पर स्वार हो कर प्रगट हुए महाराज जी को देखकर डाकू ने महाराज जी पर गोली चलाई लेकिन सभी गोलियाँ आधे रास्ते में ही गिर पडी महाराज जी के चमत्कार को देखकर डाकू महाराज जी के क़दमों में गिर पडा और अपने किये की छमा मांगने लगा महाराजजी ने उसे युवती को छोड़ देने को कहा उसने युवती को छोडा दिया युवती ने आचार्य जी का कोटि कोटि धन्यवाद किया महाराज जी ने डाकू को सदुपदेश देकर चोरी जैसे कुकर्म को छोड़ देने को कहा डाकू उस दिन से आप की शरण में आ गाया और परमेश्वर भगति करने लगा
This article is written & share by Dr.Ram kumar ,Nasik

5 comments:

  1. research based lekh padhkar kafi jankari mili.

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  2. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  3. इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  4. Granth Sahib written by Jagat Gure Grib Dass Ji Maharaj(And Sat Gure Kabir Sahib Ji)is Really a "JAGAT GURU GRANTH SAHIB JI MAHARAJ".Every body from any part of World can find truth and only truth from this Granth.It is not against any religion and even not in favour of any particular religion, So, every body from India,must respect this Granth.Sat Sahib................................

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  5. Sat Sahib

    Thankyou for giving all of us a nice experience to go through jivan parichay of bandishod.it was an awesome experience to read all those stories.a few mistakes are there which need to be cleared.

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