Sunday, April 23, 2017

आदि सनातन पंथ हमारा





आदि सनातन पंथ हमारा



एक दिन शाम के समय सतगुरु गरीबदास जी महाराज अपने शिष्यों के साथ घूमते हुए उन्हें कल्याणकारी सुन्दर उपदेश दे रहे थे की उसी समय एक श्वेत बाज आकाश में उड़ते उड़ते अचानक महाराज जी के हाथ पर आ बैठा | यह देखकर सभी शिष्य आश्चर्य चकित रह गए | इस घटना का वास्तविक भेद जानने के लिए  शिष्यों में उत्सकता बढने लगी | सभी शिष्यों ने महाराज जी से पूछा की यह हिंसक बाज जो आप की कलाई पर बैठा है इस के ऐसे व्यवहार का क्या कारण है और यह बाज कौन है जो आप से इस प्रकार का  व्यवहार कर रहा है ?
सतगुरु जी ने कहा की जिस समय हम काशी में रहते थे तो हमारी कर्मकांड रहित उपासना के उपदेश का पंडित लोग बहुत विरोध करते थे | इसी तरह इस्लाम धर्म के अपूर्ण सिद्धांतों और कट्टरता के विरोध में हमारी टीका टिपण्णी करने के कारण काजी लोग हम से द्वेष करते थे | उन्हें हमारे युक्तियुक्त आक्षेपों का कोई  उत्तर तो आता नहीं था | अत: वह हमसे इर्ष्या करते थे | क्यूंकि संतमत एक स्वतंत्र मत है, जिसके सिद्धांत बाकियों से अलग हैं | संत मत मुख्यतः तीन को मान्यता देता है  |  सत्यपुरुष, सतगुरु और संत | सतगुरु जी ने कहा की हमारा यह पंथ शुरू से चला आया है और यही सच्चा पंथ है | यथा –

आदि सनातन पंथ हमारा, जानत नाही यहु संसारा || १ ||

पंथों सेती पंथ अलहदा, भेषों बीच पर्या है बहदा || २ ||

षट दर्सन सभ षटपट होई, हमरा पंथ न पावे कोई || ३ ||

हिन्दू तुरक कदर नहीं जानै, रोजा ग्यासी करै धिगतानै || ४ ||

दोन्यू दीन यकीन न आसा, वै पूरव वै पछम निवासा || ५ ||

दहुं दीन का छा्ड़या लेखा, उत्तर दक्षण मैं हम देख्या || ६ ||

गरीब दास हम निहचै जान्या, चारयों कूट दसौं दिश ध्याना || ७ ||

महाराज जी कहने लगे की मतभेद होने के कारण काजी और पंडित हमें नीचा दिखाने और कष्ट पहुँचाने के लिए तत्पर रहते थे | हमारे खिलाफ तरह तरह के षड्यंत्र रचते रहते | हमें काफ़िर कहके सिकंदर लोदी को हमें दण्ड देने को उकसाते रहते | एक बार लोधी ने बहकावे में आकर एक काजी और उसके मुग़ल अनुचर के द्वारा हम पर हमला करवा दिया | सतपुरुष की कोप दृष्टि से वह दोनों मर गए | इस दृष्य को देख कर लोधी आतंकित हो गया और उसने बड़ी दीनता से बिनती की कि हे दयामय ! हमारे अपराध को क्षमा करके इन दोनों को जीवित कर दीजिये | हमने उसकी प्रार्थना को स्वीकार कर, उन दोनों को जीवन दान दे दिया | इस घटना का वर्णन पारख  के अंग में इस प्रकार आता है |

काज़ीमुल्लां बांहधति, लगी गर्दनी पांच |
गरीबदास काज़ी परया, निकल गई जहां कांच || ६२३ ||

मारया तुका मुगुल कूं, लग्या जुलहदी हीक |
गरीबदास मंजन महल, भ्रुकुटी में ससिभान || ६३८ ||

काजी चुतड पग लग्या, बैठे हो गये बेग |
गरीबदास उस मुग़ल कै तुके  ही का नेग || ६३६ ||

महारज जी ने कहा की यह बाज वही मुग़ल है | हमारा दर्शन करने से इसको पुर्वार्ता स्मरण हो आई | अत: अपने पूर्व कृत अपराध की पुन: क्षमा याचना करने हमारे पास आया है |
बन्दीछोड जी ने कहा – पक्षीराज ! हमने तो पहले ही तुम्हारे अपराध को क्षमा कर दिया था, अब पुन: क्षमा प्रदान करते हैं | महाराज जी के इतना कहते ही वह बाज आकाश में उड़ गया |

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